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Showing posts from April, 2020

किसान पुत्र जरूर पढ़ें

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#किसानपुत्र जरूर पढें.. शायद आपको पता नहीं होगा हमारा देश चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है, समय समय पर यूरोपियन यूनियन/अमेरिका/ईरान द्वारा लगाये गये तमाम प्रतिबंधों के बावजूद ... आज भी हम वर्ल्ड लार्जेस्ट एक्सपोर्टर हैं बासमती राइस के... मतलब देश अगर विदेशी मुद्रा अर्जित करता है तो किसान के उत्पाद से... भारतीय बासमती के बहुत सारे कन्ससाइनमेंट यूएस/ईयू में क्वालिटी टेस्ट नहीं पास कर पाते हैं... क्यों ? वहाँ पर बैन पेस्टिसाइड की बासमती में उपस्थिती के कारण... पेस्टिसाइड किसान खुद नहीं बनाता... उसे बाजार/व्यापारी देता... किसान को पता भी नहीं होता कौनसा पेस्टिसाइड बैन है... सरकारें उस पेस्टिसाइड के उत्पादन/बिक्री पर रोक लगाती नहीं... अगर लगायें, तो भी बैनड पेस्टिसाइड भी बनिया बेचता रहता है... उसे सिर्फ मुनाफा चाहिये... किसान से बासमती बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है, 1800 से 3000 हजार रुपयेप्रति क्विंटल के बीच... लेकिन एक्सपोर्ट प्राइस 900 से 1150 यूएस डॉलर हैं (एफओबी शिपिंग एयर पोर्ट इन इंडिया) 50 किलो के ... मतलब लगभग 70,000 रुपये 50 किलो के... मतलब 1 लाख 40,000 रुपये प्रति क्विंटल ....

अपनों की तलाश सात समुंदर पार से कौशांबी तक खींच लाई।

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👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍 अपने वंशजों की खोज में यूरोपीय महादीप के एक छोटे देश माल्टा से कौशाम्बी,प्रयागराज,उ.प्र.पहुंचे भारतीय मूल के लोध हेंड्रिक कालका:लोधी राजेश राजपूत 👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍👍 अंतर्राष्ट्रीय सर्वधर्म अनुयायी लोधी लोधा लोध राजपूत एकता मिशन के अध्यक्ष लोधी राजेश राजपूत के अनुसार  3 मार्च 2020 को यूरोपीय महाद्वीप के छोटे से देश माल्टा में जन्में भारतीय मूल के लोध हेंड्रिक कालका अपने पूर्वजों को खोजते-खोजते उ.प्र.के कौशाम्बी प्रयागराज पहुंच गए।वह काफी मशक्कतों के बाद सिराथू तहसील के उस गांव में भी गए,जहां से वर्षों पहले उनके पुरखों को अंग्रेज सूरीनाम मजदूरी कराने ले गए थे।दादा की जुबानी गांव के बारे में जो सुना था,उसी के आधार पर उन्होंने अपनी खोज शुरू की। हालांकि,अभी हेंड्रिक कालका अपने वंशजों तक तो नहीं पहुंच सके,लेकिन उस मिट्टी को खोज निकाला,जिसमें उनकी जड़े हैं।सिराथू तहसील के कनवार गांव से 1895 में अंग्रेज बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजदूरों को अपने साथ सूरीनाम में ले गए,जिसमें सीताराम लोध भी शामिल थे।तमाम यातनाएं झेलते हुए सीताराम लोध ने अपने बच्चों और परि...

"काश मोदी जी अमेरिका को कह पाते कि हम किसी के दबाव में नहीं है।"

#काश इंदिरा की तरह मोदी भी कह पाते, कि कोई भी देश भारत को आदेश देने का दुस्साहस न करे!  #3दिसंबर, 1971... पाकिस्तान ने पश्चिमी भारत के आठ सैनिक अड्डों पर हमला किया। पाकिस्तान की योजना थी कि पहले हमला बोल कर भारत को क्षति पहुंचाई जा सकेगी। लेकिन भारतीय सेना सुरक्षित पीछे हट गई। #प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जनरल मानेक शॉ इस मौके का इंतजार कर रहे थे। जनरल जेएस अरोड़ा के अभूतपूर्व नेतृत्व में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को घेर लिया था।  #राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तान की ओर से हस्तक्षेप किया। भारत को आक्रमणकारी घोषित किया, कई तरह के प्रतिबंध थोपे और संयुक्त राष्ट्र में युद्ध विराम का प्रस्ताव ले गए। रूस भारत के साथ खड़ा था, उसने वीटो कर दिया। #निक्सन ने 9 दिसंबर को अमेरिका का सातवां युद्धक बेड़ा भारत की ओर रवाना किया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा, हिन्दुस्तान किसी से नहीं डरता, चाहे सातवां बेड़ा हो या सत्तरवां। #अमेरिका ने सेना वापस लेने का दबाव बनाया तो इंदिरा गांधी ने दो टूक शब्दों में कहा, 'कोई देश भारत को आदेश देने का दुस्साहस न करे।'  #अमेरिका के जवाब...

इजराइल का जन्म........ अरब मुस्लिम देशों का विरोध

अरब देशों की कड़ी आपत्ति के बीच इसराइल का जन्म एक स्वतंत्र देश के रूप में हुआ था. इसराइल को दुनिया भर में अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता हासिल करने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है. 14 मई, 1948 को इसराइल की घोषणा हुई और उसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने उसे मान्यता दे दी. तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने भी इसराइल को उसी दिन मान्यता दे दी थी. डेविड बेन ग्युरियन इसराइल के पहले प्रधानमंत्री बने. इन्हें ही इसराइल का संस्थापक भी कहा जाता है. तब भारत इसराइल के गठन के ख़िलाफ़ था. भारत को फ़लस्तीन में इसराइल का बनना रास नहीं आया था और उसने संयुक्त राष्ट्र में इसके ख़िलाफ़ वोट किया था. संयुक्त राष्ट्र ने इसराइल और फ़लस्तीन दो राष्ट्र बनाने का प्रस्ताव पास किया था और इसे दो तिहाई बहुमत मिला था. दो नवंबर 1917 को बलफोर घोषणापत्र आया था. भारत ने पहले विरोध किया फिर मान्यता दी यह घोषणापत्र ब्रिटेन की तरफ़ से था जिसमें कहा गया था कि फ़लस्तीन में यहूदियों का नया देश बनेगा. इस घोषणापत्र का अमरीका ने भी समर्थन किया था. हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रुजवेल्ट ने 1945 में आश्वा...