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Showing posts from December, 2019

राजनीति और राजनीति करना अलग अलग पहलू हैं:-

राजनीति एक अलग मुद्दा होता है और राजनीति करना एक अलग तरीका होता है राजनीतिक व्यक्ति सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं का जायजा नहीं कर सकता और सुरक्षा संबंधी व्यक्तित्व के लोग राजनैतिक अदाओं को नहीं समझ सकते इन दोनों में शायद बहुत अंतर हो सकता है और इसी कारण किसी भी संस्थान का या किसी भी ऑर्गनाइजेशन का अपना अहम रोल होता है चाहे वह पॉलीटिकल पार्टी हो चाहे वह सुरक्षा एजेंसियों मैं यहां किसी की बुराई नहीं करता परंतु इस लेख को देख कर के मेरे अंदर जो अभिव्यक्ति जगी उसको प्रस्तुत करने की मैं कोशिश कर रहा हूं हो सकता है नई सरसरी निगाहें कुछ दूसरी जगहों पर जाने की कोशिश कर रही हो और मैं उसी को बयां करने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन सेना का अनुशासन में होना बहुत जरूरी होता है क्योकि जब सेना का अनुशासन टूटता है तो कोई देश पाकिस्तान बन जाता है...।। बहुत साल पहले पाकिस्तान ने सत्ता के लिए सेना का राजनीतिकरण करने की सियासत शुरू की थी,आज पाकिस्तान उसका परिणाम भोग रहा...।। चूंकि सेना का महत्व तब सबसे ज्यादा बढ़ जाता है जब बार्डर पर तनाव की स्थिति हो और गैर अनुशासित सेना अपना महत्व बनाये रखने के लिए बार्...

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा "जूठन"

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' :- मेरी माँ मेहनत मजदूरी के साथ-साथ आठ दस तगाओं (हिंदू-मुसलमान) के घर तथा घेर (मर्दों का बैठकखाना तथा मवेशियों को बाँधने की जगह) में साफ-सफाई का काम करती थी । इस काम में मेरी बहन, बड़ी भाभी तथा जसवीर और जनेसर (दो भाई) माँ का हाथ बटाते थे । बड़ा भाई सुखवीर तगाओं के यहाँ वार्षिक नौकर की तरह काम करता था । प्रत्येक तगा के घर में दस से पंद्रह मवेशी सामान्य बात थी । उनका गोबर उठाकर गाँव से बाहर कुरडि़यों पर या उपले बनाने की जगह पर डालना पड़ता था । प्रत्येक घेर से हर रोज पाँच छह टोकरे गोबर निकलता था । सर्दी के महीनों में यह काम बहुत ही कष्टदायक होता था । गाय, बैल और भैंस को सर्दी से बचाने के लिए बड़े-बड़े दालानों में बाँध जाता था जिनमें गन्ने की सूखी पाती या फूस बिछा होता था । रातभर जानवरों का गोबर और मूत्र उसी दालान में फैलता रहता था । दस-पंद्रह दिनों बाद एक बार पाती बदली जाती थी या उसके ऊपर सूखी पाती बिछा दी जाती थी । इतने दिनों में दालानों में भरी दुर्गंध से गोबर ढूँढ़-ढूँढ़ कर निकालना बहुत तकलीफदेह होता था । दुर्गंध से सिर भिन्ना जाता था । ...

NRC के फायदे और नुकसान

                 NRC के फायदे और नुकसान बेहद ज़रूरी पोस्ट.....इसे अपनी वाल पर ज़रूर लगायें, कॉपी करके व्हाट्सअप पर भेजें एनआरसी के पक्ष में बोलने से पहले एक बार अपनी पढ़ाई तो दुरस्त कर लीजिए. केंद्र सरकार के खुद के आंकड़ों के हिसाब से इस देश में... * "30 करोड़" लोग लैंडलेस हैं यानी उनके पास कोई जमीन नहीं है (ये आंकड़ा अरुण जेटली ने भी सदन में बताया था जब वह मुद्रा योजना लागू कर रहे थे)* जब इन लोगों के पास जमीन नहीं है तो किसकी जमीन के डाक्यूमेंट्स दिखाएंगे? * “170 लाख" लोग होमलेस हैं, यानी उनके पास रहने के लिए घर ही नहीं है. कोई सड़क पर सोता है कोई झुग्गी बनाकर, कोई फ्लाईओवर के नीचे, कोई रैनबसेरा में. ऐसा मैं नहीं कह रहा, केंद्र सरकार की सर्वे करने वाली संस्था NSSO कह रही है. अब मकान ही नहीं है तो क्या सड़क के कागज दिखाएंगे ये लोग, कि कौन सी सड़क के किस फ्लाईओवर के नीचे सोते हैं. * 15 करोड़ "विमुक्त एवं घुमंतुओं की आबादी है, आपने बंजारे, गाड़िया लोहार, बावरिया, नट, कालबेलिया, भोपा, कलंदर, भोटियाल आदि के नाम सुने ही होंगे. इनके रहने, ठह...