राजनीति और राजनीति करना अलग अलग पहलू हैं:-
राजनीति एक अलग मुद्दा होता है और राजनीति करना एक अलग तरीका होता है राजनीतिक व्यक्ति सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं का जायजा नहीं कर सकता और सुरक्षा संबंधी व्यक्तित्व के लोग राजनैतिक अदाओं को नहीं समझ सकते इन दोनों में शायद बहुत अंतर हो सकता है और इसी कारण किसी भी संस्थान का या किसी भी ऑर्गनाइजेशन का अपना अहम रोल होता है चाहे वह पॉलीटिकल पार्टी हो चाहे वह सुरक्षा एजेंसियों मैं यहां किसी की बुराई नहीं करता परंतु इस लेख को देख कर के मेरे अंदर जो अभिव्यक्ति जगी उसको प्रस्तुत करने की मैं कोशिश कर रहा हूं हो सकता है नई सरसरी निगाहें कुछ दूसरी जगहों पर जाने की कोशिश कर रही हो और मैं उसी को बयां करने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन
सेना का अनुशासन में होना बहुत जरूरी होता है क्योकि जब सेना का अनुशासन टूटता है तो कोई देश पाकिस्तान बन जाता है...।।
बहुत साल पहले पाकिस्तान ने सत्ता के लिए सेना का राजनीतिकरण करने की सियासत शुरू की थी,आज पाकिस्तान उसका परिणाम भोग रहा...।।
चूंकि सेना का महत्व तब सबसे ज्यादा बढ़ जाता है जब बार्डर पर तनाव की स्थिति हो और गैर अनुशासित सेना अपना महत्व बनाये रखने के लिए बार्डर पर तनाव बनाये रखती है और इस तरह अपना महत्व बनाकर सेना के उच्च पदस्थ अधिकारी सत्ता के भागीदार बन कर सत्ता की मलाई के भागीदार बनते है लेकिन इसकी कीमत हमेशा सामान्य जवान और देश का लोकतन्त्र उठाता है....।।
उदाहरण के रूप में हमारा पड़ोसी पाकिस्तान है जहाँ की सेना का अनुशासन टूट चुका है,वह सत्ता की भागीदार है,वह सत्ता से बड़े बड़े ठेके-पट्टे भी लेती है....।
और जब सेना को इग्नोर करके वहां की लोकतांत्रिक हुकूमत कोई फैसले लेना चाहती है तो सेना लोकतांत्रिक हुकूमत की सत्ता पलट देती है या बार्डर पर तनाव क्रिएट कर देती है,इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है कि जब हिंदुस्तान में बाजपेयी जी की गवर्नमेंट थी,उस समय पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ और बाजपेयी जी के बीच कश्मीर मुद्दे सहित तमाम मुद्दों पर एक बड़ा एग्रीमेंट कंक्रीट होने जा रहा था लेकिन उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने नवाज शरीफ का तख्ता पलट दिया और कारगिल जैसी घटना घटित हो गयी....।।
इसके अतिरिक्त भारत और पाक के बीच विदेश नीति की विफलता में भी पाक की सेना,आईएसआई और वहाँ की कटरपंथी ताकतों का बड़ा योगदान होता है क्योकि यह तीनों एक दूसरे को लिंक करते है और इनको इग्नोर करके पाकिस्तान की लोकतांत्रिक हुकूमत भारत के प्रति अपने स्वतन्त्र विदेश नीति का संचालन नही कर पाती है....।।
अब आप भारत को देखिए-
भारत मे आज से छह साल पूर्व सेना का अनुशासन मेंटेन था, सेना अपना नियत काम करती थी लेकिन सामान्य जन में सेना का कोई चर्चा नही होता था लेकिन आज हालात यह है कि बार बार यह नारे उठते है कि "सेना के साथ हो कि नही.." "आई स्टैंड विथ आर्मी" यह नारे यू ही नही उठ रहे है बल्कि मोदी सरकार ने अपनी राजनीति के लिए सेना के राजनीतिकरण करने की शुरुआत की है.….परिणाम भी आप देख रहे है कि मात्र छह साल से बार्डर पर जबरजस्त तनाव है खूब ज्यादा सेलिंग हो रही है,बार्डर से औसतन हर तीसरे चौथे दिन तिरंगे में लपेटकर जवानो के शव भारत आये है,जवानो की शहादत वर्ष 2014 के मुकाबले मोदी सरकार में 93%बढ़ गए है,सीजफायर के वायलेशन कई हज़ार गुना बढ़ गए है....।।
आप कभी सोचते है कि ऐसा क्यो हो रहा है...??
इसका एकमात्र उत्तर है कि सेना सत्ता के मलाई में हिस्सेदार बनना चाहती है और सत्ता सेना का राजनीतिकरण करके उसका राजनीतिक लाभ लेना चाहती है और उसी का नतीजा यह है कि बार्डर पर तनाव कैसे कम हो?जवानो की शहादत कैसे कम हो? इसके कोई राजनीतिक समाधान के प्रयास नही किये जा रहे है बल्कि सैन्य समाधान की संकल्पना थोपकर मोदी सरकार सेना की इम्पोर्टेंस के बहाने अपनी सत्ताखोरी की राजनीति कर रही है तो दूसरी तरफ सेना भी सत्ता की मलाई खाने के लिए लोकतांत्रिक राजनीति में अब भागीदार बने रहने का ख्वाब देख रही है और आंतरिक राजनीति पर स्टेटमेन्ट दे रही है...।।
कल सेना प्रमुख विपिन रावत का बयान सेना के बढ़ते राजनीतिकरण की पुष्टि करता है,दीपक रावत का बयान उनके ओहदे के प्रतिकूल है बावजूद वो इस तरह के बयान देकर क्या साबित करना चाहते है...??
आज हमारी मोदी हुकूमत सत्ता के लिए वही सब कर रही है जो पाकिस्तान ने बहुत वर्ष पहले सत्ता की भूख को तुष्ट करने के लिए शुरू किया था...।
आज हमारे वहां भी सेना का राजनीतिकरण जोरो पर है,सेना प्रमुख सियासी स्टेटमेन्ट दे रहा है,आंतरिक राजनीति में कट्टरपंथियों की संख्या बढ़ रही है....।।
यह सब चीजें यदि किसी को न दिख रही हो तो वह देखना शुरू करे और विरोध करे अन्यथा मोदी का "नया भारत" और कुछ नही बल्कि भविष्य का पाकिस्तान ही है..।।
सुप्रभात…..🙏🙏
#शेम_शेम_विपिनरावत
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