ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा "जूठन"
ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा 'जूठन' :-
मेरी माँ मेहनत मजदूरी के साथ-साथ आठ दस तगाओं (हिंदू-मुसलमान) के घर तथा घेर (मर्दों का बैठकखाना तथा मवेशियों को बाँधने की जगह) में साफ-सफाई का काम करती थी । इस काम में मेरी बहन, बड़ी भाभी तथा जसवीर और जनेसर (दो भाई) माँ का हाथ बटाते थे । बड़ा भाई सुखवीर तगाओं के यहाँ वार्षिक नौकर की तरह काम करता था ।
प्रत्येक तगा के घर में दस से पंद्रह मवेशी सामान्य बात थी । उनका गोबर उठाकर गाँव से बाहर कुरडि़यों पर या उपले बनाने की जगह पर डालना पड़ता था । प्रत्येक घेर से हर रोज पाँच छह टोकरे गोबर निकलता था । सर्दी के महीनों में यह काम बहुत ही कष्टदायक होता था । गाय, बैल और भैंस को सर्दी से बचाने के लिए बड़े-बड़े दालानों में बाँध जाता था जिनमें गन्ने की सूखी पाती या फूस बिछा होता था । रातभर जानवरों का गोबर और मूत्र उसी दालान में फैलता रहता था । दस-पंद्रह दिनों बाद एक बार पाती बदली जाती थी या उसके ऊपर सूखी पाती बिछा दी जाती थी । इतने दिनों में दालानों में भरी दुर्गंध से गोबर ढूँढ़-ढूँढ़ कर निकालना बहुत तकलीफदेह होता था । दुर्गंध से सिर भिन्ना जाता था ।
इन सब कामों के बदले में मिलता था , दो जानवर पीछे फसल के समय पाँच सेर अनाज । यानी लगभग ढाई किलो अनाज । दस मवेशी वाले घर से साल भर में 25 सेर (12-13 किलो) अनाज । दोपहर के समय हर घर से एक बची खुची रोटी जो खासतौर पर चूहड़ों को देने के लिए आटे में भूसी मिलाकर बनाई जाती थी । कभी-कभी जूठन भी भंगन की टोकरी में डाल दी जाती थी ।
शादी-ब्याह के मौकों पर जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते थे तो चूहड़े दरवाजे के बाहर बड़े-बड़े टोकरे लेकर बैठे रहते थे । बारात के खाना खा चुकने पर जूठी पत्तलें उन टोकरों में डाल दी जाती थीं, जिन्हें घर ले जा कर वे जूठन इकट्ठा कर लेते थे । पूरी के बचे खुचे टुकड़े, एक- आध मिठाई का टुकड़ा या थोड़ी बहुत सब्जी पत्तल पर पाकर बाँछें खिल जाती थीं । जिस बारात की पत्तलों से जूठन कम उतरती थी, कहा जाता था कि भुक्खड़ लोग आ गए हैं , सारा चट कर गए हैं । अक्सर ऐसे मौकों पर बड़े-बूढ़े ऐसी बारातों का जिक्र बहुत रोमांचक लहजे में सुनाया करते थे कि उस बारात से इतनी जूठन आई कि महीनों खाते रहे थे ।
पत्तलों से जो पूरियों के टुकड़े एकत्र होते थे उन्हें धूप में सुखा लिया जाता था । चारपाई पर कोई कपड़ा डालकर उन्हें फैला दिया जाता था । अक्सर मुझे पहरे पर बैठाया जाता था क्योंकि सूखने वाली पूरियों पर कौए, मुर्गियाँ, कुत्ते अक्सर टूट पड़ते थे । जरा सी आँख बची कि पूरियाँ साफ, इसलिए डंडा लेकर चारपाई के पास बैठना पड़ता था ।
ये सूखी पूरियाँ बरसात के कठिन दिनों में बहुत काम आती थीं । उन्हें पानी में भिगोकर उबाल लिया जाता था । उबली हुई पूरियों पर बारीक मिर्च और नमक डालकर खाने में मजा आता था । कभी-कभी गुड़ डालकर लुगदी जैसा बनाया जाता था, जिसे सभी बड़े चाव से खाते थे ।
आज जब मैं इन सब बातों के बारे में सोचता हूँ तो मन के भीतर काँटे जैसे उगने लगते हैं । कैसा जीवन था ।
दिन-रात मर-खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्रा जूठन, फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं । कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई पश्चाताप नहीं ।
जब मैं छोटा था, माँ के साथ जाता था । माँ-पिताजी का हाथ बँटाने । तगाओ (त्यागियों) के खाने को देखकर अक्सर सोचा करता था कि हमें ऐसा खाना क्यों नहीं मिलता है ? आज जब सोचता हूँ तो जी मितलाने लगता है ।
अभी पिछले वर्ष मेरे निवास पर सुखदेव सिंह त्यागी का पोता सुरेंद्र सिंह आया था, किसी इंटरव्यू के सिलसिले में । गाँव से मेरा पता लेकर आया था । रात में रुका ।
मेरी पत्नी ने उसे यथासंभव अच्छा खाना खिलाया । खाना खाते-खाते वह बोला, ‘‘भाभी जी, आपके हाथ का खाना तो बहुत जायकेदार है । हमारे घर में तो कोई भी ऐसा खाना नहीं बना सकता है ।’’
उसकी बात सुनकर मेरी पत्नी तो खुश हुई लेकिन मैं काफी देर तक विचलित रहा । बचपन की घटनाएँ स्मृति का दरवाजा खटखटाने लगीं ।
सुरेंद्र तब पैदा भी नहीं हुआ था । उसकी बड़ी बुआ यानी सुखदेव सिंह त्यागी की लड़की की शादी थी । उनके यहाँ मेरी माँ सफाई करती थी । शादी से दस-बारह दिन पहले से माँ-पिताजी ने सुखदेव सिंह त्यागी के घर-आँगन से लेकर बाहर तक के अनेक काम किए थे । बेटी की शादी का मतलब गाँवभर की इज्जत का सवाल था । कहीं कोई कमी नहीं रह जाए । गाँवभर की चारपाइयों को ढो-ढोकर इकट्ठा किया था पिताजी ने ।
बारात खाना खा रही थी । माँ टोकरा लिए दरवाजे से बाहर बैठी थी । मैं और मेरी छोटी बहन माया माँ से सिमटे बैठे थे, इस उम्मीद में कि भीतर से जो मिठाई और पकवानों की महक आ रही है वह हमें भी खाने को मिलेंगे ।
जब सब लोग खा-खाकर चले गए तो मेरी माँ ने सुखदेव सिंह त्यागी को दालान से बाहर आते देखकर कहा, ‘‘चौधरी जी, ईब तो सब खाणा खा के चले गए ....... म्हारे जाकतों कू भी एक पत्तल पर धर कू कुछ दे दो ! वो बी तो इस दिन का इंतजार कर रे ते ।’’
सुखदेव सिंह ने जूठी पत्तलों से भरे टोकरे की तरफ इशारा करके कहा, ‘‘टोकरा भरके जो जूठन ले जा रही है...उपर से जाकतों के लिए खाणा मांग री है । अपणी औकात में रह चूहड़ी । उठा टोकरा दरवाजे से और चलती बन ।’’ दोस्तो ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के जीवन की घटना हमे अहसास कराती है कि किस प्रकार जातिवादी कीड़े ने हमारे समाज को जकड़ रखा है कि हम इंसान को इंसान नही समझते ओर उसे जाति के आधार पर नीचा दिखाने से पीछे नही हटते! दोस्तो आज जातिवाद जैसी बुराई को खत्म करने आवश्यकता है ओर ये तभी सभंव है जब हम अपनी सोच मे परिवर्तन लाएगे! शिक्षा के स्तर को बढ़ाएगे ओर समाज मे फैली जातिवाद की विचारधारा के विरोध नई विचारधारा की क्रांन्ति लाएगे और इन सब के लिए हमे डा: भीमराव अम्बेडकर के समता मूलक समाज के लक्ष्य को एकमत रूप से स्वीकार कर नास्तिकता के साथ अंधविश्वास पाखंड और सामाजिक कुरीतियों का व्यक्तिगत स्तर पर उन्मूलन करने की आवश्यकता है!
मेरी माँ मेहनत मजदूरी के साथ-साथ आठ दस तगाओं (हिंदू-मुसलमान) के घर तथा घेर (मर्दों का बैठकखाना तथा मवेशियों को बाँधने की जगह) में साफ-सफाई का काम करती थी । इस काम में मेरी बहन, बड़ी भाभी तथा जसवीर और जनेसर (दो भाई) माँ का हाथ बटाते थे । बड़ा भाई सुखवीर तगाओं के यहाँ वार्षिक नौकर की तरह काम करता था ।
प्रत्येक तगा के घर में दस से पंद्रह मवेशी सामान्य बात थी । उनका गोबर उठाकर गाँव से बाहर कुरडि़यों पर या उपले बनाने की जगह पर डालना पड़ता था । प्रत्येक घेर से हर रोज पाँच छह टोकरे गोबर निकलता था । सर्दी के महीनों में यह काम बहुत ही कष्टदायक होता था । गाय, बैल और भैंस को सर्दी से बचाने के लिए बड़े-बड़े दालानों में बाँध जाता था जिनमें गन्ने की सूखी पाती या फूस बिछा होता था । रातभर जानवरों का गोबर और मूत्र उसी दालान में फैलता रहता था । दस-पंद्रह दिनों बाद एक बार पाती बदली जाती थी या उसके ऊपर सूखी पाती बिछा दी जाती थी । इतने दिनों में दालानों में भरी दुर्गंध से गोबर ढूँढ़-ढूँढ़ कर निकालना बहुत तकलीफदेह होता था । दुर्गंध से सिर भिन्ना जाता था ।
इन सब कामों के बदले में मिलता था , दो जानवर पीछे फसल के समय पाँच सेर अनाज । यानी लगभग ढाई किलो अनाज । दस मवेशी वाले घर से साल भर में 25 सेर (12-13 किलो) अनाज । दोपहर के समय हर घर से एक बची खुची रोटी जो खासतौर पर चूहड़ों को देने के लिए आटे में भूसी मिलाकर बनाई जाती थी । कभी-कभी जूठन भी भंगन की टोकरी में डाल दी जाती थी ।
शादी-ब्याह के मौकों पर जब मेहमान या बाराती खाना खा रहे होते थे तो चूहड़े दरवाजे के बाहर बड़े-बड़े टोकरे लेकर बैठे रहते थे । बारात के खाना खा चुकने पर जूठी पत्तलें उन टोकरों में डाल दी जाती थीं, जिन्हें घर ले जा कर वे जूठन इकट्ठा कर लेते थे । पूरी के बचे खुचे टुकड़े, एक- आध मिठाई का टुकड़ा या थोड़ी बहुत सब्जी पत्तल पर पाकर बाँछें खिल जाती थीं । जिस बारात की पत्तलों से जूठन कम उतरती थी, कहा जाता था कि भुक्खड़ लोग आ गए हैं , सारा चट कर गए हैं । अक्सर ऐसे मौकों पर बड़े-बूढ़े ऐसी बारातों का जिक्र बहुत रोमांचक लहजे में सुनाया करते थे कि उस बारात से इतनी जूठन आई कि महीनों खाते रहे थे ।
पत्तलों से जो पूरियों के टुकड़े एकत्र होते थे उन्हें धूप में सुखा लिया जाता था । चारपाई पर कोई कपड़ा डालकर उन्हें फैला दिया जाता था । अक्सर मुझे पहरे पर बैठाया जाता था क्योंकि सूखने वाली पूरियों पर कौए, मुर्गियाँ, कुत्ते अक्सर टूट पड़ते थे । जरा सी आँख बची कि पूरियाँ साफ, इसलिए डंडा लेकर चारपाई के पास बैठना पड़ता था ।
ये सूखी पूरियाँ बरसात के कठिन दिनों में बहुत काम आती थीं । उन्हें पानी में भिगोकर उबाल लिया जाता था । उबली हुई पूरियों पर बारीक मिर्च और नमक डालकर खाने में मजा आता था । कभी-कभी गुड़ डालकर लुगदी जैसा बनाया जाता था, जिसे सभी बड़े चाव से खाते थे ।
आज जब मैं इन सब बातों के बारे में सोचता हूँ तो मन के भीतर काँटे जैसे उगने लगते हैं । कैसा जीवन था ।
दिन-रात मर-खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्रा जूठन, फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं । कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई पश्चाताप नहीं ।
जब मैं छोटा था, माँ के साथ जाता था । माँ-पिताजी का हाथ बँटाने । तगाओ (त्यागियों) के खाने को देखकर अक्सर सोचा करता था कि हमें ऐसा खाना क्यों नहीं मिलता है ? आज जब सोचता हूँ तो जी मितलाने लगता है ।
अभी पिछले वर्ष मेरे निवास पर सुखदेव सिंह त्यागी का पोता सुरेंद्र सिंह आया था, किसी इंटरव्यू के सिलसिले में । गाँव से मेरा पता लेकर आया था । रात में रुका ।
मेरी पत्नी ने उसे यथासंभव अच्छा खाना खिलाया । खाना खाते-खाते वह बोला, ‘‘भाभी जी, आपके हाथ का खाना तो बहुत जायकेदार है । हमारे घर में तो कोई भी ऐसा खाना नहीं बना सकता है ।’’
उसकी बात सुनकर मेरी पत्नी तो खुश हुई लेकिन मैं काफी देर तक विचलित रहा । बचपन की घटनाएँ स्मृति का दरवाजा खटखटाने लगीं ।
सुरेंद्र तब पैदा भी नहीं हुआ था । उसकी बड़ी बुआ यानी सुखदेव सिंह त्यागी की लड़की की शादी थी । उनके यहाँ मेरी माँ सफाई करती थी । शादी से दस-बारह दिन पहले से माँ-पिताजी ने सुखदेव सिंह त्यागी के घर-आँगन से लेकर बाहर तक के अनेक काम किए थे । बेटी की शादी का मतलब गाँवभर की इज्जत का सवाल था । कहीं कोई कमी नहीं रह जाए । गाँवभर की चारपाइयों को ढो-ढोकर इकट्ठा किया था पिताजी ने ।
बारात खाना खा रही थी । माँ टोकरा लिए दरवाजे से बाहर बैठी थी । मैं और मेरी छोटी बहन माया माँ से सिमटे बैठे थे, इस उम्मीद में कि भीतर से जो मिठाई और पकवानों की महक आ रही है वह हमें भी खाने को मिलेंगे ।
जब सब लोग खा-खाकर चले गए तो मेरी माँ ने सुखदेव सिंह त्यागी को दालान से बाहर आते देखकर कहा, ‘‘चौधरी जी, ईब तो सब खाणा खा के चले गए ....... म्हारे जाकतों कू भी एक पत्तल पर धर कू कुछ दे दो ! वो बी तो इस दिन का इंतजार कर रे ते ।’’
सुखदेव सिंह ने जूठी पत्तलों से भरे टोकरे की तरफ इशारा करके कहा, ‘‘टोकरा भरके जो जूठन ले जा रही है...उपर से जाकतों के लिए खाणा मांग री है । अपणी औकात में रह चूहड़ी । उठा टोकरा दरवाजे से और चलती बन ।’’ दोस्तो ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के जीवन की घटना हमे अहसास कराती है कि किस प्रकार जातिवादी कीड़े ने हमारे समाज को जकड़ रखा है कि हम इंसान को इंसान नही समझते ओर उसे जाति के आधार पर नीचा दिखाने से पीछे नही हटते! दोस्तो आज जातिवाद जैसी बुराई को खत्म करने आवश्यकता है ओर ये तभी सभंव है जब हम अपनी सोच मे परिवर्तन लाएगे! शिक्षा के स्तर को बढ़ाएगे ओर समाज मे फैली जातिवाद की विचारधारा के विरोध नई विचारधारा की क्रांन्ति लाएगे और इन सब के लिए हमे डा: भीमराव अम्बेडकर के समता मूलक समाज के लक्ष्य को एकमत रूप से स्वीकार कर नास्तिकता के साथ अंधविश्वास पाखंड और सामाजिक कुरीतियों का व्यक्तिगत स्तर पर उन्मूलन करने की आवश्यकता है!
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